घने पराए जब ये बादल
बूंद बूंद बरसाए है
खुश्बू देस कि मिट्टी की
जाने कैसे आये है..
नन्ही नन्ही गलियारो मैं
अनजानो से चेहरो पर
जाने कैसे अपनो की सी
गीली हसी छा जाये है..
तनहा शाम का सूनापन
चहचहाट घर की सुनाये है
और बिस्तर पर का रूखा कंबल
लोरी गाके सुलाए है..
ए मेरे सपनो देखो
चाहत क्या गुल खिलाये है
के पैर चले है, निश्चित पथ पर
दिल घर की सैर कर आये है..
दिल घर की सैर कर आये है..
-आशुतोष करंदीकर
बूंद बूंद बरसाए है
खुश्बू देस कि मिट्टी की
जाने कैसे आये है..
नन्ही नन्ही गलियारो मैं
अनजानो से चेहरो पर
जाने कैसे अपनो की सी
गीली हसी छा जाये है..
तनहा शाम का सूनापन
चहचहाट घर की सुनाये है
और बिस्तर पर का रूखा कंबल
लोरी गाके सुलाए है..
ए मेरे सपनो देखो
चाहत क्या गुल खिलाये है
के पैर चले है, निश्चित पथ पर
दिल घर की सैर कर आये है..
दिल घर की सैर कर आये है..
-आशुतोष करंदीकर
Comments